Proud to be an Indian

Proud to be an Indian
Showing posts with label Hindi Poem. Show all posts
Showing posts with label Hindi Poem. Show all posts

Monday, May 23, 2011

एक स्वतंत्र पंछी की तरह उड़ने की चाह है


रचयिता: श्री गोविन्द शर्मा जी
अतिथि लेखक

1st year, MSc Engg.,
Computer Science and Automation,
Indian Institute of Science,
Bangalore.


एक स्वतंत्र पंछी की तरह उड़ने की चाह है,
सारे बंधन काटकर दौड़ने की चाह है |
क्यूँ सामजिक बंदिशें, क्यूँ ये आडम्बर का माहौल?
इन सब से ऊपर उठकर जीने की चाह है ||

किसी नवजात शिशु की तरह, किलकारने की चाह है,
लगता था जो कभी स्थायी, उस बचपन में लौटने की चाह है |
क्यूँ साधारण-असाधारण भिन्न, क्यूँ फर्क इंसान-इंसान में?
सभी भेदों को मिटाकर सोचने की चाह है ||

एक सागर की तरह सब कुछ स्वीकारने की चाह है,
दो पल के लिए रूककर हल्का होने की चाह है |
क्यूँ दूसरों से ईर्ष्या, क्यूँ आग अहंकार की?
सबको एक परिवार में संजोने की चाह है ||

अंजान थे सच्चाई से, पर अपने आप में मगन थे,
बचपन में हम जो भी करते, सम्पूर्ण लगन से |
ना कोई छुपाव, न मन-मुटाव, न किसी से भेद-भाव,
आज फिर वही रवैय्या दोहराने की चाह है ||

सच्चाई से चलकर सफलता पाने की चाह है,
निष्काम सफलता की आशा करने की चाह है |
क्यूँ तुलना करूं दूसरों से अपनी, मेरी क्या मजाल है?
हर एक प्रतियोगिता में, कम-से-कम अपने आप से जीत पाने की चाह है ||

*Picture from:www.freeeaglepictures.com with thanks

Saturday, April 30, 2011

जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा



उठो जागो भ्रस्टाचार मिटाना है
मिलजुल अपना फर्ज निभाना है
शासुधरें तो शासन सुधरे
उन सबसे पहले हम सुधरें
ना अन्याय होगा ना शोषण होगा
सबका समभाव से पोषण होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

अन्याय का विरोध है आवश्यक
समाज का साथ उससे आवश्यक
जो सशक्त हैं रिश्वत लेना बंद करें
जो अशक्त हैं रिश्वत देना बंद करें
ना कोई लाचार होगा ना बेकार होगा
सबका समभाव से रोजगार होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

गांवों में पक्की सडको का विस्तार
जन जन को शिक्षा का अधिकार
जो भ्रष्ट हैं प्रगति पथ के अवरोही
जो तटस्थ हैं कहलायेंगे देस द्रोही
ना वो जारजार होगा ना दुत्कार होगा
सबका समभाव से उपचार होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

सत्य सनातन पथ का अनुरोध
अबला पर अत्याचार का विरोध
'रजनीश' नव भारत रूपी होगा भोर
जो ना सुधरें देना होगा दंड कठोर
ना मान होगा ना अभिमान होगा
सबका समभाव से सम्मान होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

*Photo from (With Thanks):
Mayank Bhatnagar
graphicreflection.org

Thursday, June 17, 2010

जल संकट



जल संकट गहराया भाई भई समस्या बड़ी कठिन
भूमिगत जल का स्तर गिरता जाता दिन प्रतिदिन

रस्सी लाना पानी भरना गाँवों में घर घर का प्रचलन
चार महीने सूखे फिर रहना बूँद बूँद का बड़ा जतन

जिन नदियों में कभी न टूटी पानी वाली धारा
छोटे छोटे कुंड में बिखरा गर्मी में जल सारा

कर्ज से कर्ज का सूद चुकाकर नलकूप कराती जनता
मीठा जल पर बिन पैंसों के बिन बरसात न बनता

अटके प्राण असाढ़ गले में घंटों पीटे पम्पा
मानसून दस्तक दे जाए तो भगवन अनुकम्पा

बर्षा में जल का संचय चीख चीख धरती करे पुकार
वृक्षारोपण से न होगा जल बिन कल मानव लाचार

कहे रजनीश मिल जुल हम सब करें जतन
जब जल न होगा न होगा कल धरा पे जीवन

रचयिता
- रजनीश शुक्ला (रीवा, म. प्र।)
*Photo from http://photos.merinews.com/newPhotoLanding.jsp?imageID=11484

Saturday, March 27, 2010

शब्दों में कुछ उलझा जीवन ...


रचयिता: विवेक सेंगर ,
अतिथि लेखक,
भारत नव निर्माण
(Evoling New Iandia)
शब्दों में कुछ उलझा जीवन, कटु सम्मोहन व्यथा अदिश है।
राह सरल पर दिशा अवकलित, कर्म अकारथ अतुल विदित है।
[
ये जीवन लोगों क़ी बातें सुन सुन के कुछ ऐसा उलझा गया है क़ी इसमें हम काम तो करते हैं पर बिना किसी दिशा के । ये सब करने से हमारा काम तो आसान हो गया है, पर दिशा का पता ही नही चलता क़ी हम काम क्या करते हैं और क्यों ?अपने मन के लिए या बस जीने के लिए, ये सब किया गया काम दिखता तो बहुत है पर मेरे लिए ये निरर्थक है। उदहारण के लिए मै एक अच्छा गायक हूँ पर मै गायन कभी नही करता। मुझे लगता है की ज्यादा पैसा सॉफ्टवेर इंजीनियर बनने में है तो मै वही करता हूँ ]
सम्मोहन की निरह धुरी पर, कुछ लिखता कुछ सोच रहा मै।
मायापन की राह टटोलत, लक्ष्य सधा पर राह भ्रमित है।
राह सरल पर दिशा अवकलित, कर्म अकारथ अतुल विदित है
[
दुनिया के इसी सम्मोहन को देख के मै मै कुछ सोचते हुए लिखता हूँ, तो मुझे समझ आता है क़ी मै अपने लक्ष्य को तो जानता हूँ, पर उसके लिए मुझे क्या करना चाहिए ये नही समझ पाता। ये सब करने से हमारा काम तो आसान हो गया है, पर दिशा का पता ही नही चलता ....]
ओजों क़ी इश मृगतृष्णा में, है विवेक कुछ अतिव्यापित सा
अर्थों का ये दंस निरंतर, है कुछ कलुषित कुछ श्रापित सा।
अज़ा सलीखे सज़र छाव , मै अल्प निहारत स्वल्प भ्रमित है।
राह सरल पर दिशा अवकलित , कर्म अकारथ अतुल विदित है।
[इस दुनिया क़ी बड़ी-बड़ी बातें सुनकर जो क़ी संसार क़ी मृगतृष्णा है, मेरा मन बहुत सी चीजों में उलझ के रह गया है । और दुनिया क़ी ऐसी ही बड़ी-बड़ी बातें और कहानियां कुछ धोखे से और दूषित से लगते है, जिन्हें देख के मुझे लगता है क़ी मै बेकार हूँ और इस मृत्यु क़ी तरह बने संसार और जीवन में मै कुछ तो देख पाता हूँ, पर बहुत कुछ नही देख पाता। ऐसा जीवन जीनें में तो आसन है पर मै कभी अपने मन क़ी गति को कभी नही समझ पाउँगा और मेरा काम तो दिखाई देगा पर वो मैंने क्यों किया कभी नही समझ पाउँगा। ]
कभी चाह बैठा है मै मन , है अस्तित्व जताने बैठा।
रूपक को क्यों साथ लिए मै, हर व्यक्तित्व बताने बैठा।
डरा हुआ कुछ सहमा सा पर , जीवन का एक सत्य निहित है।
राह सरल पर दिशा अवकलित , कर्म अकारथ अतुल विदित है।
[
कभी-कभी मै अपने को हारा मानने लगता हूँ , तो मै अपने भूत क़ी बाते करने लगता हूँ की मैंने ये किया था, मै यहाँ का टोपर था। मैंने यहाँ रैंक लगायी थी मुझसे ये आता था वो आता था कुल मिला के मै अपने आप को समझाने लगता हूँ संक्षेप में मै बार- बार हर चीज में दुनिया के लोगों से अपने आप क़ी तुलना करने लगता हूँ , शायद यही हालत मेरे मन क़ी है और इसी में मेरे जीवन का सत्य छिपा है]
कुछ ताके ये चक्षु विकल से , क्या जाने ये गिनते क्या हैं।
अज़ा अटल विपरीत राह में , दूर खड़ी और देखे मुझको।
मेरा प्रभु भी देख मुझे , फिर हँसता देख नियोजन में है।
जान रहा वो निरंकार का , अर्थ व्यथा संवेदन में है।
पात्र बना वो कठपुतली का , खेल खिलाता व्यक्ति सदिस है।
शब्दों में कुछ उलझा जीवन , कटु सम्मोहन व्यथा अदिश है।
राह सरल पर दिशा अवकलित , कर्म अकारथ अतुल विदित है।
[बहुत समय बीत गया पर अभी भी मै अपने आप को बदल नही पाया। रोज आने वाली तारीखों को पता नही क्यों मेरा मेरी आँखें गिनती क़ी तरह गिनती है ।इसी गिनती को गिनते गिनते मै एक दिन इश दुनिया से चला जाउंगा ।जिस राह से मै इस तारीख क़ी आगे बढ़ रहा हूँ, उसी राह में मेरी मृत्युसामने से आ रही है। भगवान् भी मुझे देख के हर योजना पे हसने लगता है वो भी इस लिए क़ी उसे तो पता है क़ी इसका परिणाम क्या है ।फिर ये मुर्ख किसे धोखा दे रहा है। मै (भगवान्) जानता हूँ क़ी ऐसा नही होगा पर ये मुर्ख ये सब किये जा रहा है ।शायद कुछ इसी तरह से मुझसे ये सब करवाने वाला व्यक्ति (भगवान्) करता है ।इस दुनिया को ज्यादा अच्छे से जानता है ।शायद उसने हमारा उपयोग किया है जैसे कोई मेनेजर बिना किसी क़ी कला और रूचि को जाने बिना उससे वो काम करवाता है जो उसके मतलब का होता है। बस इसी मानसक स्थिति से प्रेरित हो के ये कविता मैंने लिखी है। शब्दों में कुछ उलझा जीवन ...कटु सम्मोहन व्यथा अदिश है....राह सरल पर दिशा अवकलित ... कर्म अकारथ अतुल विदित है।]

Monday, February 15, 2010

उसका क्या पछताना



जीवन एक दरिया जैसा,

लगातार है बहता रहता ।

बीत गया सो बीत गया,

समय हमेशा कहता रहता।

दरिया के पथ को देखो,

कभी ना होता एक समान ।

पर्वत मिलते पठार हैं मिलते,

मिलते कहीं समतल मैदान ।

शहरों में जब शांत सी बहती,

धीर -वीर गंभीर ही रहती।

कभी उंचाई से जब गिरती,

बूंदे झरती शोर है करती।

रुक जाना ही मर जाना है,

जीवन का पथ कभी न रुकता ।

सीधा हो या टेढ़ा-मेढ़ा,

लगातार ही बहता रहता ।

दरिया के पथ में कितने ही,

नए घाट हैं आते- जाते।

आज मिले कल बिछड़ गए,

होता सब यह हँसते-रोते।

नया सत्र था नया था चेहरा,

मिला था सबसे मित्र समान।

घुल-मिल कर वह खेल खेल में,

करता हर मुस्किल आसान।

हर मुश्किल में साथ खड़े हम,

सरल कठिन परवाह किये बिन।

छिन-छिन हंसकर बीत गए जो,

आखिर क्या थे वो भी दिन।

कहे रजनीश दरिया को,

अंत में सागर में मिल जाना।

बीत गया सो बीत गया,

रे मन उसका क्या पछताना ।

"रचयिता :रजनीश शुक्ला, रीवा (म.प्र.)"

*Photo by Dinesh Chandra Varshney for Bharat Nav Nirman Only

Saturday, November 21, 2009

आल्हा :हिरोशिमा दिवस- ६ अगस्त (एटम बम की शिकार बालिका सडाको की दास्तान)




रचयिता : चुन्नीलाल

चुन्नीलाल जी झोपड़ पट्टी में निवास करने वाले गरीबों की स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और उनके बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष व उनके बच्चों की शिक्षा के लिए काम करते हैं । आशा परिवार एवं जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता तथा भारत नव निर्माण के सहयोगी, सलाहकार वा अतिथि लेखक हैं ।

आल्हा, 6 अगस्त 1945 को जापान देश के हिरोशिमा शहर पर अमेरिका द्वारा किये गए परमाणु बम के हमले में लाखों लोगों की जान जाने और वहां बचे लोगों को खून का कैंसर होने, की याद दिलाता है ताकि जापान की एक बालिका की तरह लोग खून के कैंसर का शिकार न हों और परमाणु बम, मिसाइल, बारूद जैसी चीजें जो मानव,पर्यावरण,पशु-पक्षी,जीव-जंतु सभी के लिए प्राण घातक हैं, लोग इनका विरोध करें । चुनीलाल जी द्वारा दिया गया शांति सन्देश 18 अगस्त 2009 को "सिटिज़न न्यूज़ सर्विस " में भी प्रकाशित हुआ है । भारत नव निर्माण के द्वारा यह सन्देश जन-जन तक पहुचाने में प्रशन्नता का अनुभव हो रहा है । चुन्नीलाल जी का भारत नव निर्माण के सयोगी , सलाहकार वा अतिथि लेखक के रूप में हार्दिक अभिनन्दन बंदन ।

Click here to read poem "AALHA"

Tuesday, November 10, 2009

अमन चैन


आजाद नहीं पर एक मुल्क थे भारत और ए पाकिस्तान
मुक्त धरा बस एक था सपना चाहे हिन्दू या मुसलमान
मिलजुल रहे दोनों समुदाय आजादी थी एक लड़ाई
एकजुट होकर डटे रहे तो स्वतंत्र रास्ट्र की संज्ञा पाई
जाति अलग हो धर्म अलग हो भेष-भूषा रहन-सहन अलग हो
मानव तो मानव ही होता देश अलग हो खान-पान अलग हो
मानव से मानव के विरोध का जन्मजात नही कोई आधार
पर सत्ता के लोभी जन करते मन में खड़ी अंतर की दीवार
ए तेरा वो मेरा का ही जाप हमेसा करते रहते
वैचारिक मतभेदों वाली जीभ ना रुकती कहते कहते
छोटी सी बात सुलझाने वाली बड़ा मुद्दा बन जाती है
बिना वजह और बिना बिचारे नफ़रत घर कर जाती है
सत्ता की रोटी की खातिर मन में आग लगाई जाती है
भले बुरे का भेद मिटाकर सत्ता की भूख मिटाई जाती है
भारत पाक की जेलों में हजारों एक दूसरे के नागरिक
मानवता से परे झेलते मानसिक शारीरिक कष्ट अनैतिक
कूटनीति की चालों पर कुछ जेलों से छोड़े जाते हैं
पर समय के जाते उसी तादात में फिर से पकड़े जाते हैं
सिग्नल पे जब लाल हो बत्ती तो रुकता हर गाड़ी वाला
रंग बिरंगी चिडियों को पकड़े पास में आता पिजड़े वाला
अभी आजाद करुँ मैं इनको बाबू जी दे दो इतने दाम
ए दुआएं देंगे तुमको सुधरेंगे सारे बिगड़े काम
कभी कोई बड़ा दिल वाला बातों में पड़ जाता है
पंछियों को आजाद कराके वो आंगे बढ़ जाता है
चिड़ीपकड़ के अपने शागिर्द फिर से जाल बिछाते हैं
छोड़े गए अधिकतर पंछी फिर से पकड़े जाते हैं
कहे रजनीश हम सब आपसी सदभाव ना भूलें
दिल में प्रेम बड़ा लाजिमी तो शरहद को भूलें
भारत-पाक में फर्क मिटाकर आओ मिलजुल गायें
अमन चैन का बिगुल बजाकर भारत नया बनाएं
"रचयिता - रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"

Sunday, August 23, 2009

अतीत

भारत का इतिहास पुरातन गान भाव भर बैठा मन में
मैं अकिंचन करुँ निवेदन माँ शारदे आओ चिंतन में
भारतीय संस्कृति प्राचीनतम सबसे प्राचीन है भाषा संस्कृत
मिश्र रोमा यूनान का पतन पर हिंद संस्कृति अभी भी जीवित
वेदों में सब ज्ञान की बातें अपने वेदों पर हमको है मान
चीन को किसने सभ्य बनाया देकर उनको कपडो का ज्ञान
आर्यभट ने पहले सिखलाया गणित में शून्य बड़ा अनमोल
वराहमिहिर ने पहले बतलाया देखो यह पृथ्वी है गोल
आदिकाल से करते आये नौ ग्रहों की पूजा हम रोज
बाकी दुनिया वालो सुन लो बाद में की तुमने यह खोज
दुनिया में आयुर्वेद जो लाये वो थे अपने चरक महान
द्रुत करती सारी गणनाएं वैदिक गणित बड़ी आसान
अमृतसर में सोने का मंदिर सकल विश्व में भारत की शान
कोहिनूर नहीं साधारण हीरा अपितु जगत में भारत की आन
नालंदा और तक्षशिला पूरी दुनिया में थे जाने जाते
संपूर्ण विश्व से विद्यार्थी भारत में थे पढने आते
फाह्यान चीनी विद्यार्थी लिखे अद्वितीय भारत का वैभव
दुनिया तो दुनिया जैसी पर भारत एक अनोखा अनुभव
भारत एक सोने की चिडिया चन्द्रगुप्त का था जब शाशन
घरों में तालों का प्रचलन देश में था इतना अनुशाशन
अतीत हमारा गौरव शाली जरूरी इसकी गरिमा का ज्ञान
कला और संस्कृति के दम से ही विश्व में है होती पहचान
कहे रजनीश अभी समय है हम अपना अस्तित्व भूलें
अतीत हमारा गौरव शाली सब जन मिलकर बोलें
आज और कल का भेद भुलाकर आओ मिल जुल गायें
अतीत के गौरव को दुहराकर भारत नया बनायें

रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा(म. प्र।)"
*Photo by Dinesh Chandra Varshney for Bharat Nav Nirman Only

Wednesday, August 19, 2009

एक बात कहूँ


दोस्तों एक बात कहूँ
सोचता हूँ कैसे कहूँ
चलो बात की बात से कहता हूँ
एक बात ही दिल तोड़ देती है
एक बात ही दिल जोड़ देती है
अरे यह बात तो बात है,
एक बात ही जीवन मोड़ देती है

दोस्तों एक बात कहूँ
सोचता हूँ कैसे कहूँ
चलो बात की बात से कहता हूँ
बात निकलेगी तो फिर दूर तक जायेगी
बात न निकले तो फिर अपना पता पूछेगी
बात का मतलब हो या ना हो बात ही कहलाएगी
अरे यह बात तो बात है ,
बस एक बात ही तो याद रह जायेगी

दोस्तों एक बात कहूँ
सोचता हूँ कैसे कहूँ
चलो बात की बात से कहता हूँ
जीवन में कई बातो का आना होगा
एक वह बात और पीछे सारा ज़माना होगा
तुम ज़माने की बातो से मतलब ना रखना
बात कैसी भी हो हर हाल में खुश रहना


रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"

Monday, August 17, 2009

अबोध



पशु पक्षी पावक पवन जन जन में बसते भगवन
जल थल नभ में सबका पालन प्रबल प्रकृति में रहे संतुलन
दशो दिशाओं उनका शाशन हम सब उनकी प्रजा समान
जो सब दिखता उनकी रचना बच्चे हैं उनका वरदान
भागम भाग भागे जीवन तो हो जाये उथल पुथल
बेटे आज समय नहीं है कह लेना सब बाते कल
भावो का अम्बार तो क्या छोटी उसकी अभी उमर
बात वजह की पर बोले कैसे मन जो बैठा है डर
काम तो होगा नाम तो होगा होगा यह बचपन पर
चमन में है रौनक जिनसे बुझने ना पायें तारे जमीं पर
छोटी उमर में जीना मुश्किल कर आया जिम्मेदारी बनकर
उचित नहीं फुर्सत हो जाना आवासीय विद्यालय भेजकर
पॉँच अंगुलियाँ नहीं बराबर पर महत्व कम नहीं रत्ती भर
हर बच्चा जन्म है लेता जन्मजात कुछ प्रतिभा लेकर
हर जन्मे को जिंदगी अपनी जीने का जन्मसिद्ध अधिकार
पर परम्परा परिवार नाम पर होता उनपर अत्याचार
मेरे पालक उपकार बड़ा हो जो पढ़ पाओ मेरा मन
मै तो हूँ मिट्टी कुम्हार की बनाओ गाँधी या वीरप्पन
जीवन तो जीवन था मन में प्रतिशोध तो भारी है
बेटे अनुभव तो मेरा है पर अब यह तेरी बारी है
निज जीवन में जो हो पाया बेटे के जीवन से आशा
मेरे अभिभावक मै अबोध हूँ समझो मेरे मन की भाषा
कहे रजनीश अभी है हम इनसे इनका समय छीने
भविष्य देश का इनके हांथों दे जी भर इनको जीने
छोटे बड़े का भेद मिटाकर आओ मिल जुल गायें
पढ़ अबोध के मन की भाषा भारत नया बनाये

रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"

*Photo by Rajneesh Shukla for Bharat Nav Nirman only

ग्रामोदय


कश्मीर से रामेश्वर तक फैला भारत मेरा पावन देश
भेष-भूसा रहन- सहन खान-पान विविधता विशेष
कलकल करती नटखट नदियाँ विस्तृत समतल धरा अपार
कश्मीर में है केशर की खेती तो बस्तर में वन का विस्तार
आर्यवर्त गावों का देश मिल जुल कर रहे सकल समुदाय
मेहनत से उगता है मोती खेती इसका मुख्य व्यवसाय
गाँव हमारे विश्व मंच पर कृषि प्रधान होने का कारण
यदि गाँव होते कृषक होते होता जनता का पोषण
यदि गाँव में मिलती बिजली पानी और जीविका का साधन
पक्की होती कच्ची सड़कें तो निर्धन जन क्यूँ करें पलायन
कितने ही वादे किये गए नदी पे पुल पर बने नहीं
गिन चुनकर रिश्वत लेकर बने तो फिर वो टिके नहीं
वर्षो बीते शोषण में जीते तब आया पंचायती राज
अवसर धन की कर पहचान ग्रामजन करें स्वयं ही राज
अनपढ़ अनगढ़ बुझी बुझी सी है यह जनता लाचार
प्रबुद्ध प्रखर बन कैसे समझापाती अपने अधिकार
आन पड़ी विपदा बड़ी पर चिकित्सालय तो दूरी है
कैसे करें धन का उपाय तो वाहन भी मजबूरी है
गाँव के नन्हे मुन्हे बच्चे जब मीलों पैदल चलते हैं
तब जाकर शिक्षा के अक्षर उनके दामन पड़ते हैं
कहे रजनीश अभी वक़्त है हम अपना कर्त्तव्य भूलें
जब जड़े हमारी गाँवो में तो थोडा समय निकालें
गाँव शहर का भेद मिटाकर आओ मिल जुल गायें
ग्रामोदय का बिगुल बजाकर भारत नया बनायें

रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...