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Saturday, February 5, 2011

5 Myths Managers believe

Presented by: Raj Kumar Pandey
Advisor: Bharat Nav Nirman

(Evolving New India)

How should a manager behave? When you ask this question to a team member, he'll probably first describe how his manager is and what the traits he lacks are. Then he will go on and create a character much flexible and easy going then his actual manager. The qualities that the team member expects in his manager may not be the ideal ones, but the fact that he wants some change in his manager's behavior indicates that there is something that the manager is holding on to, which he should avoid. Very often managers try to live by some seeming expectations of business and simply play out roles, which turns out to be harmful for the team performing for them. This is something which results from some traditional beliefs or myths of management. Let's discuss a few.
1. Managing is about controlling and telling people what to do

From a typical manager's point of view, yes it is। But when it comes to manage a team and leading it to an end goal in its true sense, he who follows this is not in the right track. A conscientious manager tries to create excitement about a common goal in the minds of the team members and then influence their ingenuity to achieve that. Simply dictating things and creating a must-do situation often leads to lack of productivity.
2. Being a manager, you know all the answers

Managers who try to pretend that they know the answers of all the problems are those who often try to demonstrate their value to their teams but fail. Managers face tough time in finding the answers, but hesitate to communicate the problem with other team members. They don't realize that making the team members involved in decision-making and sharing concerns always help in finding a proper answer or solution to a particular problem. There may be someone in the team who might provide a better solution. So, accept it.
3. On projects, managers are solely responsible


While working on any project, each and every person working on it should have an equal share of responsibilities. Everyone should have the opportunity to step up and suggest a solution. It will help to gather different ideas and to choose the best one among many. The sense of responsibility and the feeling of "I am in" can boost up the team members. Kudos or kicks, focusing on just the managers is not a good thing to do.
4. A manager always a leader


A manager can lead his team if he has team members who are low in morals and need a push every time. But following this every now and then can have a negative effect on the members' individual growth. No one can do something perfectly at the very first time. Mistakes are essential to learn things. Managers should always keep in mind this and encourage their team members to make crucial decisions. The supportive role of a manager is always helpful in the team's success.
5. Managers are born, not made

If you have the belief that managerial skills are in-born traits and can't be earned, you better think over it once again, because it is not true. Managerial skills are learned traits and can be improved through practice. Learning from own observations and mistakes is the key to become an ideal manager.

*Silicon India के सौजन्य से साभार

Friday, May 14, 2010

महत्वपूर्ण है: ख़ास मित्र के साथ दो कप चाय


संकलन कर्ता : दिनेश चंद्र वार्श्नेय
http://www.arthkaam.com/ के सौजन्य से साभार
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी -जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय में बोध कथा "कांच की बरनी और २ कप चाय" हमें याद आती है। दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने वाले हैं। उन्होंने अपने साथ लाई एक कांच के बरनी (जार) टेबल पर रखी और उसमे टेबल टेनिस की गेंदे डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक उसमे एक भी गेंद सामने की जगह नहीं बची। उन्होंने छात्रों से पूंछा क्या बरनी पूरी भर गयी ? हाँ आवाज़ आयी फिर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे -छोटे कंकर उसमे भरने शुरू किये , धीरे- धीरे बरनी को हिलाया तो काफी सारे कंकर उसमे जहाँ जगह खाली थी , समां गए, फिर से प्रोफ़ेसर साहेब ने पूंछ- क्या बरनी भर गयी, छात्रों ने एक बार फिर हाँ कहा। अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरू किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गयी। अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे, फिर प्रोफ़ेसर साहब ने पूंछा क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गयी है ना ? हाँ अब तो पूरी भर गयी सभी ने एक स्वर में कहा । सर ने टेबल के नीचे से चाय के २ कप निकाल कर उसमें की चाय जार में डाली चाय भी रेत के बीच में स्थित थोड़ी सी जगह में सोख ली गयी । प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज़ में समझाना शुरू किया इस कांच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो । टेबल टेनिस की गेंदे सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात अन्य जीवों की सहायता करना , परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य, और शौक हैं । छोटे-छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बड़ा मकान आदि है । रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव, झगडे हैं । अब यदि कांच की बरनी में तुमने सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिए जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिए होते, तो गेंद नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी । ठीक यही बात जीवन पर भी लागू होती है। यदि तुम छोटी छोटी बातों के पीछे पड़े रहोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिए अधिक समय नहीं रहेगा, मन के सुख के लिए क्या जरूरी है, ये तुम्हे तय करना है अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फेंको, मेडिकल चेकअप करवाओ, टेबल टेनिस की गेंदों की फ़िक्र पहले करो । वही महत्वपूर्ण है पहले तय करो की क्या जरूरी है ? बाकी सब तो रेत है। छात्र बड़े ध्यान से सुन रहे थे । अचानक एक ने पूंछा सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि चाय के दो कप क्या हैं? प्रोफ़ेसर मुस्कुराए और बोले मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यूं नहीं किया । इसका उत्तर यह है कि जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे लेकिन अपने ख़ास मित्र की साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेसा होनी चाहिए ।
*Photo by Rajneesh Shukla for Bharat Nav Nirman Only

Monday, April 26, 2010

Global Warming : An individual awareness

Written by: S. Jaganathan

The world of change is affecting mankind drastically , just thinking a bit on the reason for the change and solution for the bad effects ,the answer without any doubt is : Human Being. Being the most intelligent species on this earth, we need to be aware on certain things.

"Control + S= Save" in computer terms.

Control + Yes : Save World for Global Welfare.

Control: Poaching + Yes: Save Animals .

Control: Wastage of water + Yes: Save Drought.

Control: Cutting of trees & Plants + Yes: Save Forests.

Control: Pollution + Yes: Save natural resources.

Control: Wastes ( Recycling) +Yes: Save surroundings.

In general , we are all aware what's going wrong surrounding us, we can never deny the fact one doesn't know , how smoking affects our health. But , even then the smoking rate is progressive . Just being aware , we all continue to do some or the other things which might lead in destructive results not only to us, but also to this common address of all us i.e, 'Earth'.Even though we might not be the reason for the solution, lets be the cause for suggestion.Lets suggest ourselves in what we need to focus on. Global warming is just not caused due to the reason's above, our ecological balance has collapsed. Irregularities everywhere. Global WAR'ming in a different dimension... Trust, Love, Dependency,Care, Sharing these words are slowly loosing its value..The world is becoming itself independent.. We just can't imagine the sun and moon being independent....We can't imagine our solar system being independently operated..We can't imagine nature to behave independently . If all of the above occurs, we might have to experience global warming and more severe natural disasters .Let's love mankind and let mankind love " The Mother Nature" Let's try to protect & survive as well. To add more value to this post in Bharat Navnirman blog, I felt its worth to share a video which was shared to me by a friend of mine.
I am sorry , I am unable to provide exact information on the courtesy of the video , in any case thanks to QUERCUS , for that touching and thoughtful video.

Thursday, April 15, 2010

सफलता के सात आध्यात्मिक नियम


ला जोला कैलीफोर्निया में “द चोपड़ा सेंटर फार वेल बीइंग” के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी डा.दीपक चोपड़ा ने अपनी पुस्तक “सफलता के सात आध्यात्मिक नियम” में सफलता के लिए जरूरी बातों का उल्लेख निम्न प्रकार से किया है :
जीवन में सफलता हासिल करने का वैसे तो कोई निश्चित फार्मूला नहीं है लेकिन मनुष्य सात आध्यात्मिक नियमों को अपनाकर कामयाबी के शिखर को छू सकता है।
१)अच्छा स्वास्थ्य,
२)ऊर्जा,
३)मानसिक स्थिरता,
४)अच्छा बनने की समझ और
५) मानसिक शांति आवश्यक है।
“एजलेस बाडी, टाइमलेस माइंड” और “क्वांटम हीलिंग” जैसी 26 लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक डा.चोपड़ा के अनुसार सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति में
१)विशुद्ध सामर्थ्य,
२)दान,
३)कर्म,
४)अल्प प्रयास,
५)उद्देश्य और इच्छा,
६)अनासक्ति और धर्म का होना आवश्यक है।
पहला नियम:
विशुद्ध सामर्थ्य का पहला नियम इस तथ्य पर आधारित है कि व्यक्ति मूल रूप से विशुद्ध चेतना है, जो सभी संभावनाओं और असंख्य रचनात्मकताओं का कार्यक्षेत्र है। इस क्षेत्र तक पहुंचने का एक ही रास्ता है। प्रतिदिन मौन. ध्यान और अनिर्णय का अभ्यास करना। व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय के लिए मौन.बोलने की प्रकिया से दूर. रहना चाहिए और दिन में दो बार आधे घंटे सुबह और आधे घंटे शाम अकेले बैठकर ध्यान लगाना चाहिए।इसी के साथ उसे प्रतिदिन प्रकृति के साथ सम्पर्क स्थापित करना चाहिए और हर जैविक वस्तु की बौद्धिक शक्ति का चुपचाप अवलोकन करना चाहिए। शांत बैठकर सूर्यास्त देखें. समुद्र या लहरों की आवाज सुनें तथा फूलों की सुगंध को महसूस करें ।विशुद्ध सामर्थ्य को पाने की एक अन्य विधि अनिर्णय का अभ्यास करना है। सही और गलत, अच्छे और बुरे के अनुसार वस्तुओं का निरंतर मूल्यांकन है –“निर्णय’ । व्यक्ति जब लगातार मूल्यांकन, वर्गीकरण और विश्लेषण में लगा रहता है, तो उसके अन्तर्मन में द्वंद्व उत्पन्न होने लगता है जो विशुद्ध सामर्थ्य और व्यक्ति के बीच ऊर्जा के प्रवाह को रोकने का काम करता है। चूंकि अनिर्णय की स्थिति दिमाग को शांति प्रदान करती है. इसलिए व्यक्ति को अनिर्णय का अभ्यास करना चाहिए। अपने दिन की शुरुआत इस वक्तव्य से करनी चाहिए- “आज जो कुछ भी घटेगा, उसके बारे में मैं कोई निर्णय नहीं लूंगा और पूरे दिन निर्णय न लेने का ध्यान रखूंगा।”
दूसरा नियम:
सफलता का दूसरा आध्यात्मिक नियम है।- देने का नियम। इसे लेन- देन का नियम भी कहा जा सकता है। पूरा गतिशील ब्रह्मांड विनियम पर ही आधारित है। लेना और देना- संसार में ऊर्जा प्रवाह के दो भिन्न- भिन्न पहलू हैं । व्यक्ति जो पाना चाहता है, उसे दूसरों को देने की तत्परता से संपूर्ण विश्व में जीवन का संचार करता रहता है।देने के नियम का अभ्यास बहुत ही आसान है। यदि व्यक्ति खुश रहना चाहता है तो दूसरों को खुश रखे और यदि प्रेम पाना चाहता है तो दूसरों के प्रति प्रेम की भावना रखे। यदि वह चाहता है कि कोई उसकी देखभाल और सराहना करे तो उसे भी दूसरों की देखभाल और सराहना करना सीखना चाहिए । यदि मनुष्य भौतिक सुख-समृद्धि हासिल करना चाहता है तो उसे दूसरों को भी भौतिक सुख- समृद्धि प्राप्त करने में मदद करनी चाहिए।
तीसरा नियम:
सफलता का तीसरा आध्यात्मिक नियम, कर्म का नियम है। कर्म में क्रिया और उसका परिणाम दोनों शामिल हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- “कर्म मानव स्वतंत्रता की शाश्वत घोषणा है॥ हमारे विचार, शब्द और कर्म। वे धागे हैं, जिनसे हम अपने चारों ओर एक जाल बुन लेते हैं। .. वर्तमान में जो कुछ भी घट रहा है. वह व्यक्ति को पसंद हो या नापसंद, उसी के चयनों का परिणाम है जो उसने कभी पहले किये होते हैं।कर्म, कारण और प्रभाव के नियम पर इन बातों पर ध्यान देकर आसानी से अमल किया जा सकता है... आज से मैं हर चुनाव का साक्षी रहूंगा और इन चुनावों के प्रति पूर्णतः साक्षीत्व को अपनी चेतन जागरूकता तक ले जाऊंगा। जब भी मैं चुनाव करूंगा तो स्वयं से दो प्रश्न पूछूंगा.. जो चुनाव मैं करने जा रहा हूं. उसके नतीजे क्या होंगे और क्या यह चुनाव मेरे और इससे प्रभावित होने वाले लोगों के लिए लाभदायक और इच्छा की पूर्ति करने वाला होगा। यदि चुनाव की अनुभूति सुखद है तो मैं यथाशीघ्र वह काम करूंगा लेकिन यदि अनुभूति दुखद होगी तो मैं रुककर अंतर्मन में अपने कर्म के परिणामों पर एक नजर डालूंगा। इस प्रकार मैं अपने तथा मेरे आसपास के जो लोग हैं. उनके लिए सही निर्णय लेने में सक्षम हो सकूंगा।.
चौथा नियम:
सफलता का चौथा नियम “अल्प प्रयास का नियम” है। यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि प्रकृति प्रयत्न रहित सरलता और अत्यधिक आजादी से काम करती है। यही अल्प प्रयास यानी विरोध रहित प्रयास का नियम है। प्रकृति के काम पर ध्यान देने पर पता चलता है कि उसमें सब कुछ सहजता से गतिमान है। घास उगने की कोशिश नहीं करती, स्वयं उग आती है। मछलियां तैरने की कोशिश नहीं करतीं, खुद तैरने लगती हैं, फूल खिलने की कोशिश नहीं करते, खुद खिलने लगते हैं और पक्षी उडने की कोशिश किए बिना स्वयं ही उडते हैं। यह उनकी स्वाभाविक प्रकृति है। इसी तरह मनुष्य की प्रकृति है कि वह अपने सपनों को बिना किसी कठिन प्रयास के भौतिक रूप दे सकता है।मनुष्य के भीतर कहीं हल्का सा विचार छिपा रहता है जो बिना किसी प्रयास के मूर्त रूप ले लेता है। इसी को सामान्यतः चमत्कार कहते हैं लेकिन वास्तव में यह अल्प प्रयास का नियम है। अल्प प्रयास के नियम का जीवन में आसानी से पालन करने के लिए इन बातों पर ध्यान देना होगा॥- मैं स्वीकृति का अभ्यास करूंगा। आज से मैं घटनाओं, स्थितियों, परिस्थितियों और लोगों को जैसे हैं। वैसे ही स्वीकार करूंगा, उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार ढालने की कोशिश नहीं करूंगा। मैं यह जान लूंगा कि यह क्षण जैसा है, वैसा ही होना था क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ऐसा ही है । मैं इस क्षण का विरोध करके पूरे ब्रह्मांड से संघर्ष नहीं करूंगा, मेरी स्वीकृति पूर्ण होगी। मैं उन स्थितियों का, जिन्हें मैं समस्या समझ रहा था, उनका उत्तरदायित्व स्वयं पर लूंगा। किसी दूसरे को अपनी स्थिति के लिए दोषी नहीं ठहराऊंगा। मैं यह समझूंगा कि प्रत्येक समस्या में सुअवसर छिपा है और यही सावधानी मुझे जीवन में स्थितियों का लाभ उठाकर भविष्य संवारने का मौका देगी।॥ ॥मेरी आज की जागृति आगे चलकर रक्षाहीनता में बदल जाएगी। मुझे अपने विचारों का पक्ष लेने की कोई जरूरत नहीं पडेगी। अपने विचारों को दूसरों पर थोपने की जरूरत भी महसूस नहीं होगी । मैं सभी विचारों के लिए अपने आपको स्वतंत्र रखूंगा ताकि एक विचार से बंधा नहीं रहूं। ..
पांचवा नियम:
सफलता का पांचवां आध्यात्मिक नियम “उद्देश्य और इच्छा का नियम” बताया गया है। यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि प्रकृति में ऊर्जा और ज्ञान हर जगह विद्यमान है। सत्य तो यह है कि क्वांटम क्षेत्र में ऊर्जा और ज्ञान के अलावा और कुछ है ही नहीं। यह क्षेत्र विशुद्ध चेतना और सामर्थ्य का ही दूसरा रूप है। जो उद्देश्य और इच्छा से प्रभावित रहता है।ऋग्वेद में उल्लेख है॥ प्रारंभ में सिर्फ इच्छा ही थी जो मस्तिष्क का प्रथम बीज थी। मुनियों ने अपने मन पर ध्यान केन्द्रित किया और उन्हें अर्न्तज्ञान प्राप्त हुआ कि प्रकट और अप्रकट एक ही है। उद्देश्य और इच्छा के नियम का पालन करने के लिए व्यक्ति को इन बातों पर ध्यान देना होगा॥ उसे अपनी सभी इच्छाओं को त्यागकर उन्हें रचना के गर्त के हवाले करना होगा और विश्वास कायम रखना होगा कि यदि इच्छा पूरी नहीं होती है तो उसके पीछे भी कोई उचित कारण होगा । हो सकता है कि प्रकृति ने उसके लिए इससे भी अधिक कुछ सोच रखा हो। व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म में वर्तमान के प्रति सतर्कता का अभ्यास करना होगा और उसे ज्यों का त्यों स्वीकार करना होगा लेकिन उसे साथ ही अपने भविष्य को उपयुक्त इच्छाओं ओर दृढ उद्देश्यों से संवारना होगा।
छठवां नियम:
सफलता का छठा आध्यात्मिक नियम अनासक्ति का नियम है। इस नियम के अनुसार व्यक्ति को भौतिक संसार में कुछ भी प्राप्त करने के लिए वस्तुओं के प्रति मोह त्यागना होगा। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि वह अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने उद्देश्यों को ही छोड दे । उसे केवल परिणाम के प्रति मोह को त्यागना है। व्यक्ति जैसे ही परिणाम के प्रति मोह छोड देता है। उसी वह अपने एकमात्र उद्देश्य को अनासक्ति से जोड लेता है। तब वह जो कुछ भी चाहता है। उसे स्वयमेव मिल जाता है।अनासक्ति के नियम का पालन करने के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना होगा॥ आज मैं अनासक्त रहने का वायदा करता हूं। मैं स्वयं को तथा आसपास के लोगों को पूर्ण रूप से स्वतंत्र रहने की आजादी दूंगा। चीजों को कैसा होना चाहिए। इस विषय पर भी अपनी राय किसी पर थोपूंगा नहीं। मैं जबरदस्ती समस्याओं के समाधान खोजकर नयी समस्याओं को जन्म नहीं दूंगा। मैं चीजों को अनासक्त भाव से लूंगा। सब कुछ जितना अनिश्चित होगा। मैं उतना ही अधिक सुरक्षित महसूस करूंगा क्योंकि अनिश्चितता ही मेरे लिए स्वतंत्रता का मार्ग सिद्ध होगी। अनिश्चितता को समझते हुए मैं अपनी सुरक्षा की खोज करूंगा।॥
सातवां नियम:
सफलता का सातवां आध्यात्मिक नियम. धर्म का नियम. है। संस्कृत में धर्म का शाब्दिक अर्थ..जीवन का उद्देश्य बताया गया है। धर्म या जीवन के उद्देश्य का जीवन में आसानी से पालन करने के लिए व्यक्ति को इन विचारों पर ध्यान देना होगा.. ..मैं अपनी असाधारण योग्यताओं की सूची तैयार करूंगा और फिर इस असाधारण योग्यता को व्यक्त करने के लिए किए जाने वाले उपायों की भी सूची बनाऊंगा। अपनी योग्यता को पहचानकर उसका इस्तेमाल मानव कल्याण के लिए करूंगा और समय की सीमा से परे होकर अपने जीवन के साथ दूसरों के जीवन को भी सुख.समृद्धि से भर दूंगा। हर दिन खुद से पूछूंगा..मैं दूसरों का सहायक कैसे बनूं और किस प्रकार मैं दूसरों की सहायता कर सकता हूं। इन प्रश्नों के उत्तरों की सहायता से मैं मानव मात्र की प्रेमपूर्वक सेवा करूंगा।
*Photo by Dinesh Chandra Varshney for Bharat Nav Nirman only
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