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Saturday, April 30, 2011

जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा



उठो जागो भ्रस्टाचार मिटाना है
मिलजुल अपना फर्ज निभाना है
शासक सुधरें तो शासन सुधरे
उन सबसे पहले हम सुधरें
ना अन्याय होगा ना शोषण होगा
सबका समभाव से पोषण होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

अन्याय का विरोध है आवश्यक
समाज का साथ उससे आवश्यक
जो सशक्त हैं रिश्वत लेना बंद करें
जो अशक्त हैं रिश्वत देना बंद करें
ना कोई लाचार होगा ना बेकार होगा
सबका समभाव से रोजगार होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

गांवों में पक्की सडको का विस्तार
जन जन को शिक्षा का अधिकार
जो भ्रष्ट हैं प्रगति पथ के अवरोही
जो तटस्थ हैं कहलायेंगे देस द्रोही
ना वो जारजार होगा ना दुत्कार होगा
सबका समभाव से उपचार होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

सत्य सनातन पथ का अनुरोध
अबला पर अत्याचार का विरोध
'रजनीश' नव भारत रूपी होगा भोर
जो ना सुधरें देना होगा दंड कठोर
ना मान होगा ना अभिमान होगा
सबका समभाव से सम्मान होगा
जब भ्रस्टाचार मुक्त तंत्र होगा
तब भारत हमारा स्वतंत्र होगा |

*Photo from (With Thanks):
Mayank Bhatnagar
graphicreflection.org

Thursday, January 28, 2010

गरीब आज भी बिना राशनकार्ड के



लेखक: चुन्नीलाल जी (सामाजिक कार्यकर्ता)


Click here to read the article"गरीब आज भी बिना राशनकार्ड के"

*photo by Dinesh Chandra Varshney for bharat nav nirman only

Saturday, November 28, 2009

बोल दिल्ली तू क्या कहती है ?


लेखक: रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)

रामू काका अस्सी वर्ष की उमर में चाय की चुस्की के साथ ही दिन की सुरुआत करते हैं । मुनमुन बिटिया ने आज उन्हें सुबह से चाय का प्याला नहीं थमाया । सुबह से उनका मन उतरा उतरा सा है । घर में शक्कर ख़तम है क्योकि इस बार सहकारी समिति की दूकान से कई परिवारों को वितरित नहीं की गयी । वितरक ने 3 बोरी शक्कर अकेले ठाकुर साहब के परिवार को दे दी । उनकी बिटिया लाडो की महीने के दूसरे पखवार में शादी जो है ।

चुन्नू और रानी अषाढ़ के पूरे महीने स्कूल नहीं गए । शासकीय प्राथमिक विद्यालय मझियार , सीधी (म. प्र.) की छत से पानी टपकने की वजह से स्कूल के अन्दर पानी जो भरा हुआ है । मास्टर जी भी फूले नहीं समा रहे हैं और खुश क्यूँ न हों ? दोपहर में बच्चो को दिया जाने वाला अनाज उनके घर के लिए जो बच गया ।

बुढापे में नरेश काका के लिए जीविकोपार्जन का एक मात्र साधन उनकी खुद की 2 बीघा जमीन है । जब से तकरीबन आधा बीघा जमीन पटवारी साहब के नक़्शे से गुम हुई है वो आये दिन कचहरी के चक्कर लगाते रहते हैं । जमीन से ज्यादा की कीमत तो वो पेशकार को खिला चुके हैं पर पता नहीं कब न्याय मिलेगा ?

जब भ्रस्टाचार का दर्द मुझसे देखा नहीं गया तो मैंने दिल्ली से पूंछा की इस पर तू क्या कहती है ? दिल्ली ने सीना फुलाकर कहा मैं तो अपना काम इमानदारी से करती हूँ । नीचे के लेवल पर मेरी योजनाओं का क्रियान्वयन सही तरीके से होता नहीं । मुझे इसकी जानकारी बढ़िया से नहीं होती कि राज्य और पंचायतें किस तरह घपला करती हैं । दिल्ली की बातें सुनकर मुझे सुकून मिला कि चलो बापू की शहीद भूमि में तो राम राज्य जीवित है । आखिर पूरे देश से चुनकर आये कर्मठ रास्ट्र सेवक जो यहाँ निवाश करते हैं । मै इस इरादे से लौटने वाला था कि वापस जाकर अपने क्षेत्र के लोगों का दिल्ली के प्रति झूठे भ्रम को तोडूंगा । इसकी इमानदारी का गुणगान करके लोगों का नेताओं के प्रति खोया विश्वाश पुनर्जीवित करूँगा । लेकिन यह क्या ? यह सुबह सुबह कैसी खबर पढ़ रहा हूँ ? दिल्ली नगर निगम में बिना अस्तित्व के हजारो वेतन भोगी ? काल्पनिक कर्मचारियों को करोड़ो का वेतन ? दिल्ली ऐसे 22,853 कर्मचारियों को तनख़्वाह दे रही है जिनका वजूद ही नहीं
है ।


मुझे अपने भोलेपन पे तरश आया कि कैसे दिल्ली ने दिन के उजाले में मुझसे अपना असली चेहरा छिपाया । ट्रेन दिल्ली से 2 घंटे की दूरी तय कर चुकी थी । अखबार को साथ की बर्थ में बैठे एक सज्जन को थमा कर बाहर के नज़ारे देखने लगा । मै मन ही मन सोच रहा था कि पंचायत और जनपद से क्या कहूंगा ? यही कि तुम लोग पैसे लिए बिना काम नहीं करते और दिल्ली तो पैसे लेकर भी काम नहीं करती ।
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