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Friday, September 25, 2009

मंदबुद्धि बच्चा अभिशाप नहीं है



लेखिका : डॉ० दीप्ति मिश्रा

प्रस्तुत द्वारा: चुन्नीलाल (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)

मैंने हमेसा से इस बात पर जोर दिया है की बच्चे एक फूल की तरह होते हैं । यदि उन्हें सही environment ना मिले तो यह फूल मुरझा सकता है । जिस तरह से पांच अंगुलियाँ बराबर नहीं होती, उसी तरह हर बच्चे एक सामान नहीं होते पर हमारी यह जिम्मेदारी है कि देश रूपी चमन का हर एक फूल अपनी प्रकृति के अनुसार खिले और रौनक बढाये । हमें इसके पौधे को समुचित रूप से खाद और पानी तो देना चाहिए पर इसके nature से छेड़ छाड़ नहीं करनी चाहिए । बच्चा स्वयं ही एक अच्छे स्वरुप को प्राप्त कर लेगा । "मंदबुद्धि बच्चा अभिशाप नहीं है!" यह लेख सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (CNS) में 19 सितम्बर 2009 को प्रकाशित हुई । आप इसे CNS की वेबसाइट से पढ़ सकते हैं ।
"रजनीश"

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Monday, August 17, 2009

अबोध



पशु पक्षी पावक पवन जन जन में बसते भगवन
जल थल नभ में सबका पालन प्रबल प्रकृति में रहे संतुलन
दशो दिशाओं उनका शाशन हम सब उनकी प्रजा समान
जो सब दिखता उनकी रचना बच्चे हैं उनका वरदान
भागम भाग भागे जीवन तो हो जाये उथल पुथल
बेटे आज समय नहीं है कह लेना सब बाते कल
भावो का अम्बार तो क्या छोटी उसकी अभी उमर
बात वजह की पर बोले कैसे मन जो बैठा है डर
काम तो होगा नाम तो होगा होगा यह बचपन पर
चमन में है रौनक जिनसे बुझने ना पायें तारे जमीं पर
छोटी उमर में जीना मुश्किल कर आया जिम्मेदारी बनकर
उचित नहीं फुर्सत हो जाना आवासीय विद्यालय भेजकर
पॉँच अंगुलियाँ नहीं बराबर पर महत्व कम नहीं रत्ती भर
हर बच्चा जन्म है लेता जन्मजात कुछ प्रतिभा लेकर
हर जन्मे को जिंदगी अपनी जीने का जन्मसिद्ध अधिकार
पर परम्परा परिवार नाम पर होता उनपर अत्याचार
मेरे पालक उपकार बड़ा हो जो पढ़ पाओ मेरा मन
मै तो हूँ मिट्टी कुम्हार की बनाओ गाँधी या वीरप्पन
जीवन तो जीवन था मन में प्रतिशोध तो भारी है
बेटे अनुभव तो मेरा है पर अब यह तेरी बारी है
निज जीवन में जो हो पाया बेटे के जीवन से आशा
मेरे अभिभावक मै अबोध हूँ समझो मेरे मन की भाषा
कहे रजनीश अभी है हम इनसे इनका समय छीने
भविष्य देश का इनके हांथों दे जी भर इनको जीने
छोटे बड़े का भेद मिटाकर आओ मिल जुल गायें
पढ़ अबोध के मन की भाषा भारत नया बनाये

रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"

*Photo by Rajneesh Shukla for Bharat Nav Nirman only

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