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Friday, September 25, 2009

एक गांव के सामूहिक संघर्ष की प्रेरणादायक कहानी


लेखकः संदीप पाण्डेय

यह कहानी सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (CNS) में ५ सितम्बर २००९ को प्रकाशित हुई । पाठक गण इस कहानी को CNS की वेबसाइट से पढ़ सकते हैं । यह कहानी उदहारण है :कैसे गांव और देश की जनता विभिन्न चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बन सकती है ।

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Monday, August 17, 2009

ग्रामोदय


कश्मीर से रामेश्वर तक फैला भारत मेरा पावन देश
भेष-भूसा रहन- सहन खान-पान विविधता विशेष
कलकल करती नटखट नदियाँ विस्तृत समतल धरा अपार
कश्मीर में है केशर की खेती तो बस्तर में वन का विस्तार
आर्यवर्त गावों का देश मिल जुल कर रहे सकल समुदाय
मेहनत से उगता है मोती खेती इसका मुख्य व्यवसाय
गाँव हमारे विश्व मंच पर कृषि प्रधान होने का कारण
यदि गाँव न होते कृषक न होते न होता जनता का पोषण
यदि गाँव में मिलती बिजली पानी और जीविका का साधन
पक्की होती कच्ची सड़कें तो निर्धन जन क्यूँ करें पलायन
कितने ही वादे किये गए नदी पे पुल पर बने नहीं
गिन चुनकर रिश्वत लेकर बने तो फिर वो टिके नहीं
वर्षो बीते शोषण में जीते तब आया पंचायती राज
अवसर धन की कर पहचान ग्रामजन करें स्वयं ही राज
अनपढ़ अनगढ़ बुझी बुझी सी है यह जनता लाचार
प्रबुद्ध प्रखर बन कैसे समझापाती अपने अधिकार
आन पड़ी विपदा बड़ी पर चिकित्सालय तो दूरी है
कैसे करें धन का उपाय तो वाहन भी मजबूरी है
गाँव के नन्हे मुन्हे बच्चे जब मीलों पैदल चलते हैं
तब जाकर शिक्षा के अक्षर उनके दामन पड़ते हैं
कहे रजनीश अभी वक़्त है हम अपना कर्त्तव्य न भूलें
जब जड़े हमारी गाँवो में तो थोडा समय निकालें
गाँव शहर का भेद मिटाकर आओ मिल जुल गायें
ग्रामोदय का बिगुल बजाकर भारत नया बनायें

रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"

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