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Monday, January 18, 2010

भाइयों ने नहीं दिया, तो पत्नी ने दिया मुखाग्नि


लेखक: चुन्नीलाल

पैसा जीवन में एक संसाधन से ज्यादा कुछ भी नहीं । संसाधन जो जीवन में सहूलियत लाये । जिन्दगी को आसान बनाने में मदद करे । "पैसा होने से जिन्दगी आसान, खुशहाल और संजीवी होगी", यह दुनिया के सबसे बड़े भ्रमों में से एक है । पैसा जीवन नहीं है बल्कि जीवन में मददगार है । यह जीवन रूपी विशाल System का महज छोटा सा Tool है । लेकिन कई लोग इस तुच्छ चीज के पीछे जीवन रूपी सारे System का ही नाश कर बैठते हैं । जीवन एक रचना है जिसे कई रंगों का सोच - समझकर यथा उचित उपयोग कर सुन्दर बनाया जाता है । यदि हम जीवनरूपी इस खूबसूरत कृति को केवल पैसे रूपी रंग से बिना सोचे - समझे पोत दें तो अंत में कैसा भद्दा चित्र बनेगा, इसकी कल्पना मात्र से ही मन सिहिर उठता है । जीवन में अनुभव की बाद बुद्धजीवियों ने पैसे के महत्व को कुछ इस तरह से बताया है :
1)पैसा हाथ की मैल है, आता - जाता है ।
2)पैसा गया तो समझो कुछ नहीं गया, स्वास्थ गया तो समझो कुछ गया और यदि चरित्र चला गया तो समझो सब कुछ खो दिया ।
3)जीवन को खुशहाल बनाने के लिए पैसा कमाया जाता है, खुशियों को बेचकर पैसा नहीं कमाया जाता ।

कबीरदास जी ने तो अपने जीवन में पैसे को केवल यहीं तक स्थान दिया है:
सांई इतना दीजिये जा में कुटुम समाय
मैं भी भूँखा ना रहूँ , साधु ना भूँखा जाय

अर्थात हे भगवान् ! मुझे केवल इतना ही धन दीजिये कि जिससे मैं अपने परिवार का पालन पोषण भलीं - भांति कर सकूं । कभी मुझे भूंखे पेट ना सोना पड़े और यदि मेरे घर कभी कोई अतिथि आये तो उसे भूंखे पेट वापस ना जाना पड़े । कबीर के अनुसार इसके अतिरिक्त पैसे को उन्हें अपने जीवन में शामिल नहीं करना है । लेकिन जब पैसे को मानवीय मूल्यों से बढ़कर प्राथमिकता दी जाने लगे । जब पैसे के कारण मानवीय सम्बन्ध ख़तम कर दिए जाएँ तो समझना चाहिए कि ऐसा करने वाला जीवित होते हुए भी मृतक समान है । पैसे के सामने दम तोड़ रहे मानवीय संबंधों की घटना को उजागर किया है भारत नव निर्माण ( Evolving New India) के सहयोगी, सलाहकार और लेखक चुन्नीलाल जी ने अपने आलेख "भाइयों ने नहीं दिया, तो पत्नी ने दिया मुखाग्नि" के द्वारा । आशा करता हूँ कि पाठकों के लिए यह आलेख समाज का दर्पण सिद्ध होगा।
" रजनीश"
Click here to read the article "भाइयों ने नहीं दिया, तो पत्नी ने दिया मुखाग्नि"

Tuesday, November 10, 2009

अमन चैन


आजाद नहीं पर एक मुल्क थे भारत और ए पाकिस्तान
मुक्त धरा बस एक था सपना चाहे हिन्दू या मुसलमान
मिलजुल रहे दोनों समुदाय आजादी थी एक लड़ाई
एकजुट होकर डटे रहे तो स्वतंत्र रास्ट्र की संज्ञा पाई
जाति अलग हो धर्म अलग हो भेष-भूषा रहन-सहन अलग हो
मानव तो मानव ही होता देश अलग हो खान-पान अलग हो
मानव से मानव के विरोध का जन्मजात नही कोई आधार
पर सत्ता के लोभी जन करते मन में खड़ी अंतर की दीवार
ए तेरा वो मेरा का ही जाप हमेसा करते रहते
वैचारिक मतभेदों वाली जीभ ना रुकती कहते कहते
छोटी सी बात सुलझाने वाली बड़ा मुद्दा बन जाती है
बिना वजह और बिना बिचारे नफ़रत घर कर जाती है
सत्ता की रोटी की खातिर मन में आग लगाई जाती है
भले बुरे का भेद मिटाकर सत्ता की भूख मिटाई जाती है
भारत पाक की जेलों में हजारों एक दूसरे के नागरिक
मानवता से परे झेलते मानसिक शारीरिक कष्ट अनैतिक
कूटनीति की चालों पर कुछ जेलों से छोड़े जाते हैं
पर समय के जाते उसी तादात में फिर से पकड़े जाते हैं
सिग्नल पे जब लाल हो बत्ती तो रुकता हर गाड़ी वाला
रंग बिरंगी चिडियों को पकड़े पास में आता पिजड़े वाला
अभी आजाद करुँ मैं इनको बाबू जी दे दो इतने दाम
ए दुआएं देंगे तुमको सुधरेंगे सारे बिगड़े काम
कभी कोई बड़ा दिल वाला बातों में पड़ जाता है
पंछियों को आजाद कराके वो आंगे बढ़ जाता है
चिड़ीपकड़ के अपने शागिर्द फिर से जाल बिछाते हैं
छोड़े गए अधिकतर पंछी फिर से पकड़े जाते हैं
कहे रजनीश हम सब आपसी सदभाव ना भूलें
दिल में प्रेम बड़ा लाजिमी तो शरहद को भूलें
भारत-पाक में फर्क मिटाकर आओ मिलजुल गायें
अमन चैन का बिगुल बजाकर भारत नया बनाएं
"रचयिता - रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)"
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