
जल संकट गहराया भाई भई समस्या बड़ी कठिन
भूमिगत जल का स्तर गिरता जाता दिन प्रतिदिन
रस्सी लाना पानी भरना गाँवों में घर घर का प्रचलन
चार महीने सूखे फिर रहना बूँद बूँद का बड़ा जतन
जिन नदियों में कभी न टूटी पानी वाली धारा
छोटे छोटे कुंड में बिखरा गर्मी में जल सारा
कर्ज से कर्ज का सूद चुकाकर नलकूप कराती जनता
मीठा जल पर बिन पैंसों के बिन बरसात न बनता
अटके प्राण असाढ़ गले में घंटों पीटे पम्पा
मानसून दस्तक दे जाए तो भगवन अनुकम्पा
बर्षा में जल का संचय चीख चीख धरती करे पुकार
वृक्षारोपण से न होगा जल बिन कल मानव लाचार
कहे रजनीश मिल जुल हम सब करें जतन
जब जल न होगा न होगा कल धरा पे जीवन
रचयिता - रजनीश शुक्ला (रीवा, म. प्र।)
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