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Monday, August 17, 2009

आजाद भारत


बीती निशा निरंतर निद्रा सोये थे फिरंगियों के भ्रम में
उदित हुआ आजादी का सूरज भारतवर्ष के नभ में
पुलकित जन नव रवि को नमन नव स्वपन मन चेतन नव
स्वशाषित आर्यवर्त में गूंज उठा स्वतंत्रता का स्वर नव
एकत्रित हुए रात दिन बना संविधान हुआ गणतंत्रता का गठन
जनहित में जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शाशन
प्रशस्त हुआ प्रगति का पथ पर रह रह के उठे कई सवाल
हरित खेत में फसलों के संग उगती हो जैसे शैवाल
मै हिन्दू वो मुस्लिम तो क्या पर वो मेरा भाई है
इस भाई चारे के बीच मे पर संप्रदायिकता की खाई है
हम हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई भारत नया बनायेंगे
कैसे बने सपनो का भारत जब तक आतंकवाद नहीं मिटायेंगे
देश हमारा गावों का पर ग्रामोदय एक चुनौती है
भूंख मै कैसे बिलख - बिलख यह भारत माँ रोती है
ज्ञान ज्योति का दीप जलाकर पहले मिटाओ अशिक्षा
प्रहरी बन यदि करना चाहो देश की अपनी रक्षा
कहे रजनीश अभी वक्त है जन जन की ऑंखें खोलें
आजाद हुआ भारत तो क्या झूठी जयकार न बोलें
ऊंच नींच का भेद मिटाकर आओ मिल जुल गायें
नव भारत का कर निर्माण आजादी का जश्न मनाएं
रचयिता:"रजनीश शुक्ला, रीवा (. प्र.)"
*Photo by Rajneesh Shukla for BHARAT NAV NIRMAN (Evolving New India) only

4 comments:

RUPAK_REWA said...

Welcome to Blogworld , there's an innocence in your poems , keep them alive, and i assure i'll read and comment on all of them , Best of Luck!!
Rupak. :)

Saurabh said...

tooo good Rajneesh sahaab. You are excellent

Anonymous said...

Dear Rajneesh ,
Such a nice poems........... wonderful !
keep it up and i am sure , one day i will proudly say to mass that i am a friend of great poet Rajneesh.

regards,
Abhishek Anand

rohit said...

bhaiya..>>.nice poems.spesli. third one is touching for me....>>gud luk..............

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