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Saturday, November 28, 2009

बोल दिल्ली तू क्या कहती है ?


लेखक: रजनीश शुक्ला, रीवा (म. प्र.)

रामू काका अस्सी वर्ष की उमर में चाय की चुस्की के साथ ही दिन की सुरुआत करते हैं । मुनमुन बिटिया ने आज उन्हें सुबह से चाय का प्याला नहीं थमाया । सुबह से उनका मन उतरा उतरा सा है । घर में शक्कर ख़तम है क्योकि इस बार सहकारी समिति की दूकान से कई परिवारों को वितरित नहीं की गयी । वितरक ने 3 बोरी शक्कर अकेले ठाकुर साहब के परिवार को दे दी । उनकी बिटिया लाडो की महीने के दूसरे पखवार में शादी जो है ।

चुन्नू और रानी अषाढ़ के पूरे महीने स्कूल नहीं गए । शासकीय प्राथमिक विद्यालय मझियार , सीधी (म. प्र.) की छत से पानी टपकने की वजह से स्कूल के अन्दर पानी जो भरा हुआ है । मास्टर जी भी फूले नहीं समा रहे हैं और खुश क्यूँ न हों ? दोपहर में बच्चो को दिया जाने वाला अनाज उनके घर के लिए जो बच गया ।

बुढापे में नरेश काका के लिए जीविकोपार्जन का एक मात्र साधन उनकी खुद की 2 बीघा जमीन है । जब से तकरीबन आधा बीघा जमीन पटवारी साहब के नक़्शे से गुम हुई है वो आये दिन कचहरी के चक्कर लगाते रहते हैं । जमीन से ज्यादा की कीमत तो वो पेशकार को खिला चुके हैं पर पता नहीं कब न्याय मिलेगा ?

जब भ्रस्टाचार का दर्द मुझसे देखा नहीं गया तो मैंने दिल्ली से पूंछा की इस पर तू क्या कहती है ? दिल्ली ने सीना फुलाकर कहा मैं तो अपना काम इमानदारी से करती हूँ । नीचे के लेवल पर मेरी योजनाओं का क्रियान्वयन सही तरीके से होता नहीं । मुझे इसकी जानकारी बढ़िया से नहीं होती कि राज्य और पंचायतें किस तरह घपला करती हैं । दिल्ली की बातें सुनकर मुझे सुकून मिला कि चलो बापू की शहीद भूमि में तो राम राज्य जीवित है । आखिर पूरे देश से चुनकर आये कर्मठ रास्ट्र सेवक जो यहाँ निवाश करते हैं । मै इस इरादे से लौटने वाला था कि वापस जाकर अपने क्षेत्र के लोगों का दिल्ली के प्रति झूठे भ्रम को तोडूंगा । इसकी इमानदारी का गुणगान करके लोगों का नेताओं के प्रति खोया विश्वाश पुनर्जीवित करूँगा । लेकिन यह क्या ? यह सुबह सुबह कैसी खबर पढ़ रहा हूँ ? दिल्ली नगर निगम में बिना अस्तित्व के हजारो वेतन भोगी ? काल्पनिक कर्मचारियों को करोड़ो का वेतन ? दिल्ली ऐसे 22,853 कर्मचारियों को तनख़्वाह दे रही है जिनका वजूद ही नहीं
है ।


मुझे अपने भोलेपन पे तरश आया कि कैसे दिल्ली ने दिन के उजाले में मुझसे अपना असली चेहरा छिपाया । ट्रेन दिल्ली से 2 घंटे की दूरी तय कर चुकी थी । अखबार को साथ की बर्थ में बैठे एक सज्जन को थमा कर बाहर के नज़ारे देखने लगा । मै मन ही मन सोच रहा था कि पंचायत और जनपद से क्या कहूंगा ? यही कि तुम लोग पैसे लिए बिना काम नहीं करते और दिल्ली तो पैसे लेकर भी काम नहीं करती ।

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